एक नज़रिया ये भी है…
अगर आप किसी के बिना भी सुकून से रह सकते हैं,
लेकिन फिर भी उसका साथ चुनते हैं…
तो वो मोहब्बत है।
लेकिन अगर उसके बिना हर चीज़ अधूरी,
बेचैन और बोझिल लगने लगे,
तो वो मोहब्बत नहीं,
सिर्फ एक आदत है।
हम अक्सर आदत को इश्क़ समझ बैठते हैं,
और फिर रिश्तों में गलतफ़हमियाँ पैदा होने लगती हैं।
असल मोहब्बत किसी को क़ैद नहीं करती,
बल्कि उसे बढ़ने का हौसला देती है।
उसकी आज़ादी भी बचाए रखती है
और रिश्ता भी।
क्योंकि मोहब्बत का मतलब सिर्फ साथ रहना नहीं,
बल्कि एक दूसरे की ज़िंदगी में सुकून बनना होता है।
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