Thursday, 10 September 2026

 अपना समय लीजिए…

हर किसी को अपनी तरफ़ से वक़्त भी दीजिए, जानकारी भी और महत्व भी।

फिर थोड़ा पीछे हटकर देखिए—
कौन आपकी मौजूदगी में कैसा होता है,
और आपकी गैरमौजूदगी में कैसा।

खासकर तब,
जब वही बातें किसी दूसरे के सामने दोहराई जाएँ
जिन पर कभी आप दोनों एक ही पन्ने पर खड़े थे।

वहीं से असली तस्वीर दिखने लगती है।
बातों में नहीं, व्यवहार में बदलाव देखिए।
किसके सामने सोच बदलती है,
किसके लिए शब्द बदलते हैं,
और किसके आने पर आपकी कही हुई बातों का मतलब बदल जाता है।

अगर कभी महसूस हो कि
किसी के शब्द और उसके व्यवहार के बीच फ़ासला बढ़ रहा है,
तो तुरंत सवाल मत कीजिए…
बस ख़ामोशी से थोड़ा और देखिए।

क्योंकि इंसान की असलियत
उसके कहे हुए शब्दों से कम,
और अलग-अलग लोगों के साथ उसके बदले हुए व्यवहार से ज़्यादा दिखाई देती है।

और जब तस्वीर पूरी साफ़ हो जाए…
तो किसी से शिकायत मत कीजिए।

बस अपनी जगह बदल दीजिए।

क्योंकि हर किसी को अपना सब कुछ देने के बाद भी
अगर कोई आपका नहीं हुआ,
तो शायद कमी आपके देने में नहीं थी…
वह रिश्ता ही आपका था नहीं।

Tuesday, 30 June 2026

 एक पत्थर, एक क़दम, एक आदमी ही काफ़ी है,

बदलने को ख़ानदान की बरसों पुरानी ग़ुरबत।

चाहिए मगर राह में हिम्मत, सब्र और कुर्बानी भी  ,

सिर्फ़ ख़्वाबों से तक़दीरें नहीं बदला करतीं।

है हौसला तो उठा क़दम ,

अक्सर हिसाब सदियों की बेबसी जिल्लत का ,

एक पीढ़ी की मेहनत ,जद्दोजहद देती है चुका।

 Humne rishton ko naam dena zaroori nahi samjha,

kuch log bas acche lagte hain... wajah ke bina

 कभी-कभी इश्क़ किसी शख़्स से नहीं,

उसके होने की आदत से हो जाता है।

क्यूंकि वक़्त का भी अजीब फ़ितूर है,

अजनबी को अपना और फ़ासलों को कम 

और अपने दर्द को वो मोहब्बत कर देता है।

Monday, 22 June 2026

 लगाव हो तो गिला भी होगा,

तअल्लुक़ हो तो शिकवा भी होगा।

बेज़ार रिश्तों में ख़ामोशी घर कर जाती है,

वरना यूँ ही कोई किसी का नहीं होगा।

जिस दिन लौ बुझ जाएगी एहसास की ,

शिकवे भी ख़ुद-ब-ख़ुद ख़ामोश हो जाएँगे।

फिर न तुम मेरा ज़िक्र करोगे,

न मैं तुम्हें पुकार पाऊंगा 

फिर तुम अपनी राह के मुसाफ़िर,

और मैं अपनी मंज़िल का राहगीर हो जाऊंगा

 अहमियत भी अगर अपनी बतानी पड़े,

तो तअल्लुक़ में वो बात कहाँ रहती है।

जहाँ हर जज़्बात को समझाना पड़े,

वहाँ ख़ामोशी भी ख़ामोश कहाँ रहती है।

 ज़िंदगी की सबसे कठिन बात यह नहीं होती कि कोई जानबूझकर हमारे साथ गलत करे। कठिनाई तब होती है जब गलती किसी की नीयत में नहीं, बल्कि उसके निर्णयों में होती है। कुछ फैसले उस समय सही लगते हैं, परिस्थितियाँ भी उनका साथ देती दिखाई देती हैं, लेकिन समय बीतने के बाद वही फैसले किसी और के जीवन में संघर्ष का कारण बन जाते हैं।

ऐसी परिस्थितियों में दोषी और पीड़ित की रेखा भी धुंधली हो जाती है। जिसने निर्णय लिया था, वह हर दिन भीतर ही भीतर इस बोझ के साथ जीता है कि काश उस समय कुछ और सोच लिया होता। और जिसे उन निर्णयों का परिणाम झेलना पड़ रहा होता है, वह भी जानता है कि सामने वाले की मंशा कभी गलत नहीं थी। इसलिए न वह खुलकर शिकायत कर पाता है, न दूसरा खुद को पूरी तरह माफ़ कर पाता है।

फिर एक अजीब सी ख़ामोशी दोनों के बीच रहने लगती है। कोई किसी को इल्ज़ाम नहीं देता, लेकिन दर्द दोनों के हिस्से में बराबर आता है। एक अपने किए हुए फैसलों के बोझ तले दबा रहता है, दूसरा उन फैसलों के परिणामों के साथ जीता रहता है।

शायद ज़िंदगी के कुछ दुःख ऐसे ही होते हैं जहाँ कोई अपराधी नहीं होता, फिर भी सज़ा चलती रहती है। और सबसे बड़ा दुख यह होता है कि दोनों एक-दूसरे का दर्द समझते हैं, मगर उसे कम करने की ताकत किसी के पास नहीं होती। यही वह जगह है जहाँ प्रेम, पश्चाताप और बेबसी एक साथ खड़े दिखाई देते हैं।