जिसके पास जो है, वही तो दे पाएगा दूसरों को,
कभी उसकी हँसी, कभी उसकी सादगी की तारीफ़ हो,कभी उसकी परवाह, कभी उसके प्यार की तारीफ़ हो।
लफ़्ज़ों से, परवाह से, ख़ामोशी से दिल छू लिया जाए उसका,
ज़िंदगी ख़ूबसूरत है, उसकी हर छोटी-बड़ी ख़ुशी की तारीफ़ हो।
जिसके पास जो है, वही तो दे पाएगा दूसरों को,
कभी उसकी हँसी, कभी उसकी सादगी की तारीफ़ हो,अब कोई रूठे या रूठ कर चला जाए दूर कहीं,
मनाने का उसे, ख्याल अब इस दिल में आता नहीं।
गया है वो तो दिल से यह मलाल भी गया साथ उसके,
अब कोई जाए जहाँ चाहे, मैं किसी को रोकता नहीं।
दिल भी आराम-पसंद है, कोई मिले तो मिल लेता हूँ,
वरना मैं खुद से राजी हूँ, अब किसी के पास जाता नहीं।
घंटों बातें कर लेता था, जब दिल मिल जाता था किसी से,
दिखाए कोई बेरुखी थोड़ी भी, तो अब मैं पास बैठता नहीं।
सुकून है कि लोग कम हैं, जिन्होंने बढ़ा रखी थी परेशानी,
अब कुछ भी हो जाए, घंटों किसी के बारे में सोचता नहीं।
अब अपनी ही दुनिया में खुश हूँ, यही जीने का सलीका है,
कोई साथ चले तो ठीक, न चले, मैं किसी से पूछता नहीं।
वो आम सा ही शख्श था औरों की तरह शायद,
बस मेरी चाहत ने उसे सबसे जुदा कर दिया।
कसूर उसका नहीं , मेरी सादगी का था ,
जिसने उसकी बेरुखी को भी दुआ कर दिया।
हम आदते कुछ इस तरह बिगाड़ जाएंगे तुम्हारी
की हमारे बाद कहते फिरोगे ,
ख्याल रखना है , तो उसकी तरह रखना
कभी-कभी जीवन के शुरुआती वर्षों में हम कितने उन्मुक्त और निडर होते हैं।
हमें लगता है जो करना है, कर लेंगे… चाहे जैसे करना पड़े।
फिर समय बीतता है।
अनुभव बढ़ते हैं, असफलताएँ याद रहने लगती हैं और धीरे-धीरे
हम अपनी क्षमताओं से अधिक अपनी सीमाओं पर विश्वास करने लगते हैं।
जिस काम को कभी थोड़े से प्रयास से कर गुजरने का साहस था,
उसी के बारे में अब महीनों सोचते हैं
“अगर नहीं हुआ तो?”
“लोग क्या कहेंगे?”
“अगर असफल हो गया तो?”
और विचारों का यही सिलसिला धीरे-धीरे
डर को हमारी आदत बना देता है।
लेकिन कभी-कभी ज़िंदगी में बस एक ऐसे दोस्त की ज़रूरत होती है
जो आपकी आशंकाएँ नहीं, आपकी क्षमता देखे और कहे
“अरे, कर न… तू कर लेगा।”
और सिर्फ़ इतना ही नहीं…
कभी वह आपको उन छोटी-छोटी चीज़ों की ओर भी वापस ले जाता है
जो समय के साथ कहीं पीछे छूट गई थीं
वे चीज़ें जो आपको अच्छा महसूस कराती थीं,
आपको अपने जैसा महसूस कराती थीं।
आप देखेंगे,
इन छोटी-छोटी बातों और थोड़े से सहारे से
काम वही होगा, परिस्थितियाँ वही होंगी,
मुश्किलें भी वही होंगी
लेकिन इस बार डर उतना बड़ा नहीं लगेगा।
क्योंकि धीरे-धीरे आपको फिर से
अपने ऊपर विश्वास होने लगेगा।
शायद इसलिए ज़िंदगी में यह भी ज़रूरी है कि
हम ऐसे लोगों के बीच रहें जो हमारे डर को बढ़ाएँ नहीं,
बल्कि हमारे भीतर छिपे सामर्थ्य को जगाएँ।
क्योंकि सही व्यक्ति के कुछ शब्द
सिर्फ़ हौसला नहीं देते,
वे हमारे भीतर दबे उस विश्वास को वापस ले आते हैं जो कहता है
“मैं शायद उतना कमजोर नहीं हूँ,
जितना मैंने समय के साथ खुद को मान लिया था।”
और फिर हम वही करने लगते हैं
जिसके बारे में कभी महीनों सोचकर भी रुक जाते थे।
कभी-कभी बदलाव किसी बड़ी सीख से नहीं आता…
बस किसी के विश्वास से आता है।
और कभी-कभी किसी का एक वाक्य
“तू कर लेगा।”
हमें उस इंसान से फिर मिला देता है
जो हम कभी हुआ करते थे।
यदि जीवन निरंतर दूसरों की अपेक्षाओं और स्वीकृति के इर्द-गिर्द घूमता रहे,
तो एक दिन थकान शरीर से आगे बढ़कर अस्तित्व तक पहुँच जाती है।
दूसरों के लिए करना सुंदर है,
लेकिन कभी-कभी यही निरंतरता हमें उनसे आसक्त कर देती है
उनकी ज़रूरत, उनकी प्रतिक्रिया और उनकी स्वीकृति
धीरे-धीरे हमारे अपने सुख का आधार बन जाती है।
जीवन का संतुलन शायद यही है
दूसरों का ख़याल रखते हुए भी
अपने अस्तित्व की डोर किसी और के हाथ में न सौंपना।
क्योंकि अंततः सबसे बड़ी जिम्मेदारी
सबको खुश रखना नहीं,
स्वयं को खोने से बचाए रखना है।
कुछ रिश्ते पकड़कर नहीं, महसूस करके निभाए जाते हैं,
जहाँ अपनी जगह साबित करनी पड़े… वहाँ शायद जगह थी ही नहीं।