कभी-कभी जीवन के शुरुआती वर्षों में हम कितने उन्मुक्त और निडर होते हैं।
हमें लगता है जो करना है, कर लेंगे… चाहे जैसे करना पड़े।
फिर समय बीतता है।
अनुभव बढ़ते हैं, असफलताएँ याद रहने लगती हैं और धीरे-धीरे
हम अपनी क्षमताओं से अधिक अपनी सीमाओं पर विश्वास करने लगते हैं।
जिस काम को कभी थोड़े से प्रयास से कर गुजरने का साहस था,
उसी के बारे में अब महीनों सोचते हैं
“अगर नहीं हुआ तो?”
“लोग क्या कहेंगे?”
“अगर असफल हो गया तो?”
और विचारों का यही सिलसिला धीरे-धीरे
डर को हमारी आदत बना देता है।
लेकिन कभी-कभी ज़िंदगी में बस एक ऐसे दोस्त की ज़रूरत होती है
जो आपकी आशंकाएँ नहीं, आपकी क्षमता देखे और कहे
“अरे, कर न… तू कर लेगा।”
और सिर्फ़ इतना ही नहीं…
कभी वह आपको उन छोटी-छोटी चीज़ों की ओर भी वापस ले जाता है
जो समय के साथ कहीं पीछे छूट गई थीं
वे चीज़ें जो आपको अच्छा महसूस कराती थीं,
आपको अपने जैसा महसूस कराती थीं।
आप देखेंगे,
इन छोटी-छोटी बातों और थोड़े से सहारे से
काम वही होगा, परिस्थितियाँ वही होंगी,
मुश्किलें भी वही होंगी
लेकिन इस बार डर उतना बड़ा नहीं लगेगा।
क्योंकि धीरे-धीरे आपको फिर से
अपने ऊपर विश्वास होने लगेगा।
शायद इसलिए ज़िंदगी में यह भी ज़रूरी है कि
हम ऐसे लोगों के बीच रहें जो हमारे डर को बढ़ाएँ नहीं,
बल्कि हमारे भीतर छिपे सामर्थ्य को जगाएँ।
क्योंकि सही व्यक्ति के कुछ शब्द
सिर्फ़ हौसला नहीं देते,
वे हमारे भीतर दबे उस विश्वास को वापस ले आते हैं जो कहता है
“मैं शायद उतना कमजोर नहीं हूँ,
जितना मैंने समय के साथ खुद को मान लिया था।”
और फिर हम वही करने लगते हैं
जिसके बारे में कभी महीनों सोचकर भी रुक जाते थे।
कभी-कभी बदलाव किसी बड़ी सीख से नहीं आता…
बस किसी के विश्वास से आता है।
और कभी-कभी किसी का एक वाक्य
“तू कर लेगा।”
हमें उस इंसान से फिर मिला देता है
जो हम कभी हुआ करते थे।