Tuesday, 6 October 2026

कितने ज़ख़्म लिए फिरती है,
मिलती फिर भी मुस्कुराकर,
तन्हा-तन्हा सी लगती है,
भीड़ में भी खुद को छुपाकर।

एक अजनबी मिला, जो अपना सा लगने लगा,
उसकी ख़ामोशी में भी, कोई रिश्ता सा जगने लगा।
एक ही राह, एक ही सफ़र, एक ही कारवाँ, एक ही रास्ता,
बिन कहे समझ ले जो दिल का, हर एक दर्द, हर एक वास्ता।

दर्द कहना न पड़े, कोई चुपचाप सुन ले,
आँखें नम हों अगर, कोई पलकों से चुन ले।
दूरियाँ रखें दरमियाँ, कहीं कोई ख़्वाब न बुन ले,
दिल को समझाएँ मगर, दिल कहाँ किसी की सुन ले।

रिश्ते यूँ ही मिल जाते हैं, दिलों के बिना नाम के,
कभी अजनबी भी अपने हो जाते हैं, कुछ ही मुलाक़ातों के।
जुड़ जाए दिल किसी से, तो फिर क्या नाम दें उसे,
कुछ रिश्ते बस महसूस होते हैं, कहाँ अल्फ़ाज़ दें उन्हें।

लब कुछ नहीं कहते, ख़ामोशी बहुत कुछ बयान करती है,
ज़ुबाँ भी मोहब्बत है शायद…
मगर ये कहने से अब डरती है। 

Thursday, 10 September 2026

 अपना समय लीजिए…

हर किसी को अपनी तरफ़ से वक़्त भी दीजिए, जानकारी भी और महत्व भी।

फिर थोड़ा पीछे हटकर देखिए—
कौन आपकी मौजूदगी में कैसा होता है,
और आपकी गैरमौजूदगी में कैसा।

खासकर तब,
जब वही बातें किसी दूसरे के सामने दोहराई जाएँ
जिन पर कभी आप दोनों एक ही पन्ने पर खड़े थे।

वहीं से असली तस्वीर दिखने लगती है।
बातों में नहीं, व्यवहार में बदलाव देखिए।
किसके सामने सोच बदलती है,
किसके लिए शब्द बदलते हैं,
और किसके आने पर आपकी कही हुई बातों का मतलब बदल जाता है।

अगर कभी महसूस हो कि
किसी के शब्द और उसके व्यवहार के बीच फ़ासला बढ़ रहा है,
तो तुरंत सवाल मत कीजिए…
बस ख़ामोशी से थोड़ा और देखिए।

क्योंकि इंसान की असलियत
उसके कहे हुए शब्दों से कम,
और अलग-अलग लोगों के साथ उसके बदले हुए व्यवहार से ज़्यादा दिखाई देती है।

और जब तस्वीर पूरी साफ़ हो जाए…
तो किसी से शिकायत मत कीजिए।

बस अपनी जगह बदल दीजिए।

क्योंकि हर किसी को अपना सब कुछ देने के बाद भी
अगर कोई आपका नहीं हुआ,
तो शायद कमी आपके देने में नहीं थी…
वह रिश्ता ही आपका था नहीं।

Tuesday, 30 June 2026

 एक पत्थर, एक क़दम, एक आदमी ही काफ़ी है,

बदलने को ख़ानदान की बरसों पुरानी ग़ुरबत।

चाहिए मगर राह में हिम्मत, सब्र और कुर्बानी भी  ,

सिर्फ़ ख़्वाबों से तक़दीरें नहीं बदला करतीं।

है हौसला तो उठा क़दम ,

अक्सर हिसाब सदियों की बेबसी जिल्लत का ,

एक पीढ़ी की मेहनत ,जद्दोजहद देती है चुका।

 Humne rishton ko naam dena zaroori nahi samjha,

kuch log bas acche lagte hain... wajah ke bina

 कभी-कभी इश्क़ किसी शख़्स से नहीं,

उसके होने की आदत से हो जाता है।

क्यूंकि वक़्त का भी अजीब फ़ितूर है,

अजनबी को अपना और फ़ासलों को कम 

और अपने दर्द को वो मोहब्बत कर देता है।

Monday, 22 June 2026

 लगाव हो तो गिला भी होगा,

तअल्लुक़ हो तो शिकवा भी होगा।

बेज़ार रिश्तों में ख़ामोशी घर कर जाती है,

वरना यूँ ही कोई किसी का नहीं होगा।

जिस दिन लौ बुझ जाएगी एहसास की ,

शिकवे भी ख़ुद-ब-ख़ुद ख़ामोश हो जाएँगे।

फिर न तुम मेरा ज़िक्र करोगे,

न मैं तुम्हें पुकार पाऊंगा 

फिर तुम अपनी राह के मुसाफ़िर,

और मैं अपनी मंज़िल का राहगीर हो जाऊंगा

 अहमियत भी अगर अपनी बतानी पड़े,

तो तअल्लुक़ में वो बात कहाँ रहती है।

जहाँ हर जज़्बात को समझाना पड़े,

वहाँ ख़ामोशी भी ख़ामोश कहाँ रहती है।