कितने ज़ख़्म लिए फिरती है,
मिलती फिर भी मुस्कुराकर,
तन्हा-तन्हा सी लगती है,
भीड़ में भी खुद को छुपाकर।
एक अजनबी मिला, जो अपना सा लगने लगा,
उसकी ख़ामोशी में भी, कोई रिश्ता सा जगने लगा।
एक ही राह, एक ही सफ़र, एक ही कारवाँ, एक ही रास्ता,
बिन कहे समझ ले जो दिल का, हर एक दर्द, हर एक वास्ता।
दर्द कहना न पड़े, कोई चुपचाप सुन ले,
आँखें नम हों अगर, कोई पलकों से चुन ले।
दूरियाँ रखें दरमियाँ, कहीं कोई ख़्वाब न बुन ले,
दिल को समझाएँ मगर, दिल कहाँ किसी की सुन ले।
रिश्ते यूँ ही मिल जाते हैं, दिलों के बिना नाम के,
कभी अजनबी भी अपने हो जाते हैं, कुछ ही मुलाक़ातों के।
जुड़ जाए दिल किसी से, तो फिर क्या नाम दें उसे,
कुछ रिश्ते बस महसूस होते हैं, कहाँ अल्फ़ाज़ दें उन्हें।
लब कुछ नहीं कहते, ख़ामोशी बहुत कुछ बयान करती है,
ज़ुबाँ भी मोहब्बत है शायद…
मगर ये कहने से अब डरती है।