Friday, 5 June 2020

तन्हा मैं तन्हा ख्याल और मेरा तन्हा कमरा मुझ से बातें करता है 
पूछता है मुझ से आजकल 
अब  जाके जाना तुमने, मुझे अकेले अकेले रहना कैसा लगता है। 
ज़माना ख़राब है चापलूसों  के भी आने लगे, लोग, अब रहनुमा बन के
मगर जिसकी कमर झुकी चापलूसी मैं, वो क्या चले बेचारा अब तन के 
जिसके रहमो करम पे बन रही है थोड़ी बहुत साख उसकी इधर उधर
कैसे निकाले, घर कर चुकी नस नस मैं चापलूसी जो, वो बेचारा मन से
बेइज़्ज़ती को ही अब चापलूसी का सच्चा वाला प्रसाद मान  बैठा है वो
फिर अब   बेइज़्ज़ती और  इज़्ज़त का अंतर कोई कैसे समझाए उसको। .

Friday, 29 May 2020

--------------मयखाने की गुफ्तगू-----------------

उसके जाते ही अंदर कुछ दबा सा बाहर आता है
वो तो शुक्र ये  शुक्रवार हफ्ते मैं एक बार आता है





क्या देखा हमने ये न पूछ ए दोस्त
यह पूछ क्या क्या नहीं देखा हमने

Friday, 22 May 2020

इत्ती सी बात थी बस और उसे राइ का पहाड़ बना लिया
हर बात  मैं करके राजनीती उसने खुद को गिरा लिया।
कसूर सारे मेरे जिम्मे,वाहवाही पे सिर्फ उनका ही नाम है।
ऐसे ही बनाते है सबको, आता यही उनको एक काम है।

Sunday, 17 May 2020

जब भी कभी उनसे मुलाकात का वक़्त तय हुआ, वक़्त ने तब कभी साथ न दिया
और आज जब पास वक़्त, खाली खाली से हम है तब मुलाकात नहीं हो सकती।