Thursday, 18 June 2026

 अजीब सा सुकून है उसकी मौजूदगी में…

मैं अपनी हर ख़ामोशी, हर बात उससे कह देता हूँ।

जज नहीं करता,

बस सुन लेता है मुझे…

और मैं भी दिल हल्का करके मुस्कुरा देता हूँ।

 ज़िंदगी में कुछ बातें ऐसी होती हैं

जो हर किसी को नहीं बताई जातीं। क्यूंकि 

हर इंसान सुन तो लेता है,मगर हर कोई समझे…

ये ज़रूरी नहीं होता।

शायद इसलिए एक ऐसा शख़्स हमारी ज़िंदगी होना ज़रूरी है,

जिसके सामने हम , बिना सोचे, बिना डरे,अपने दिल की बातो को कह सके या यु कहे दिल हल्का कर सके।

इसी पे मैंने कुछ लिखा था 

हर बात कह दें हम हर किसी से,

ये सही भी तो नहीं…

और वो उसी एहसास से सुन ले हमे ,

ये ज़रूरी भी तो नहीं।

इसलिए एक जिगरी ज़रूरी है ज़िंदगी में ,

यूँ हर वक़्त तन्हा होना भी तो सही नहीं।

 Apna best dene ke baad bhi

agar kisi ko tumse shikayat rahe,

to apni galti maan kar

use wahi chhod dena behtar hai.


Agar taalluq sirf kaam ka ho,

to bas kaam tak hi Simit raho…


Kyuki kuch log

apne zehan ki bani kahaniyon se

kabhi bahar nahi aa paate.


Tum chahe jitni mohabbat,

jitni sachchai se pesh aao,

wo tumhare kirdaar mein bhi

koi na koi kasoor kami dhoond hi lenge…

taaki apni soch ko sahi thehra sakein.

 Na guftagu ki talab hai, na mashwaron ki pyaas hai,

Kabhi-kabhi sukoon itne mein hai ki koi kahe — "Abe saale, apun tere saath hai."

Har masle ka hal ho, ye har baar zaroori bhi nahi,

Bas koi haath pakad kar keh de — "Fikr mat kar, hum tere saath hain.

 Daulat kam ya zyada aadmi kama hi leta hai,

kamyabi bhi use kisi na kisi manzil tak pahucha hi deti hai.


Magar zindagi kitni khubsurat guzri,

yeh na daulat batati hai, na kamyabi, na shohrat...

yeh to dil ka sukoon aur chehre ki muskurahat bayan karti hai.


Aakhir mein hisaab rutbe ka nahi hota,

ehsaas-e-khushi ka hota hai.


Isliye kamyab hone se zyada, khush rehna zaroori hai.

Zindagi to har haal mein kat hi jaati hai,

magar khushhaal guzarna aur baat hai, behaal guzarna aur.


Thoda kam ho, magar sukoon ho to zindagi haseen lagti hai;

warna daulat aur shohrat ke bawajood,

insaan andar se veeran hi rehta hai.

 घर में पड़े-पड़े गुजर जाएगी उमर तेरी...

घर से निकल, ठोकरें खा, तजुर्बे सीख।


नहीं मिलता शिखर किसी को यूँही,

रास्ते भी देते हैं ज़ख्म काई गहरे ।


देख चेहरे इस दुनिया के, ऐ दोस्त...

तब जाके रोशन होगी तकदीर तेरी।

 वो बोले

“कहां रह गए…

या चले गए तुम कोई और गली?”

हम मुस्कुरा दिये

और धीरे से बोले -

“गुफ़्तगू ख़ुद से,

खुद के बारे में,

बहुत देर तक चली...

 पहुँच गए जहाँ तक पहुंचना था, 

अब दिल बेचैन नहीं, बस मुत्मइन सा है

 चाहा उसे इस तरह की जिक्र भी न किया 

दिल में बसा लिया मगर कभी अपना न किया 

 वो औरत है...


सुबह की पहली किरण से पहले जाग जाती है,

अपने हिस्से की नींद भी अक्सर भूल जाती है।


रसोई की भाप में सपने पकाती है,

और फिर दफ़्तर की फ़ाइलों में दिन बिताती है।


घर की ज़िम्मेदारियाँ भी उसके कंधों पर,

बाहर की दुनिया से लड़ाई भी उसी के हिस्से में।


कोई पूछे तो मुस्कुरा कर कह देती है,

"सब ठीक है..."

मगर ये दो लफ़्ज़ अक्सर सबसे बड़ा झूठ होते हैं।


उसके चेहरे पर हँसी रहती है,

पर आँखों में थकान का एक समंदर भी है।

वो टूटती भी है, बिखरती भी है,

मगर हर सुबह फिर ख़ुद को समेट लेती है।


शिकायतें बहुत हैं उसके पास,

मगर वक़्त कहाँ है शिकायत करने का।

ज़िंदगी ने उसे इतना मज़बूत बना दिया,

कि अब लोग उसके दर्द को भी ताक़त समझ लेते हैं।


सबको लगता है वो खुश है,

क्योंकि वो हँसती बहुत है।

कौन समझे कि कुछ लोग रोते कम हैं,

और मुस्कुराने की कला ज़्यादा जानते हैं।


वो कमज़ोर नहीं है,

बस कभी-कभी चाहती है कि कोई उसके कंधे से भी बोझ उतार ले,

कोई उससे भी पूछे 

"आज तुम कैसी हो?" 


होंठों पे हँसी रखती है, आँखों में नमी रखती है,

घर भी सँभालती है, नौकरी भी सभी रखती है।

लोग कहते हैं बड़ी मज़बूत है ये औरत,

कौन जाने कितनी ख़ामोशियाँ दिल में दबाए रखती है। 

 एक ही डाल पे बैठे थे दो परिंदे,

दोनों अपनी-अपनी दुनिया में मशग़ूल।

एक थोड़ा सा संजीदा मिज़ाज,

तो दूसरा ख़यालों में कुछ ज़्यादा ही मशग़ूल।


यूँ ही सिलसिला-ए-गुफ़्तगू शुरू हुआ,

तो एहसास हुआ कि बातें कितनी ज़रूरी हैं।

ज़िंदगी को सिर्फ़ मोहब्बत नहीं चाहिए हर बार,

कभी-कभी बस कोई अपना, कोई हमदर्द भी ज़रूरी है।


किताबों, ख़यालों और ज़िंदगी की बातें,

और सामने कोई ख़ामोशी से सुनने वाला।

दिल के मौसम जब लफ़्ज़ों में ढलने लगें,

तो हर जुमला लगता है जैसे अपना-सा उजाला।


और जब बातें अपनी ज़िंदगी का अक्स बन जाएँ,

तो कहना भी इबादत लगे, सुनना भी सुकून।

फिर वक़्त का एहसास कहाँ रहता है,

बस चलता रहता है एहसासों का जुनून।


अंगिनत उलझनें, बे-शुमार फ़िक्रें,

फिर भी ख़्वाबों को हक़ीक़त करने का जुनून।

चेहरे पे मुस्कुराहट, दिल में हल्की सी उदासी,

और सफ़र-ए-ज़िंदगी तय करने का सुकून।


कभी अल्फ़ाज़ दिल की दास्ताँ कहते हैं,

कभी ख़ामोशियाँ भी गुनगुनाती हैं।

कोई सुकून पाता है दिल खोलकर कहने में,

किसी को चुपचाप सुनकर भी क़ुर्बत नज़र आती है।

 लगाव हो तो गिला भी होगा,

तअल्लुक़ हो तो शिकवा भी होगा।

बेज़ार रिश्तों में ख़ामोशी घर कर जाती है,

वरना यूँ ही कोई किसी का नहीं होगा।

जिस दिन लौ बुझ जाएगी एहसास की ,

शिकवे भी ख़ुद-ब-ख़ुद ख़ामोश हो जाएँगे।

फिर न तुम मेरा ज़िक्र करोगे,

न मैं तुम्हें पुकार पाऊंगा 

फिर तुम अपनी राह के मुसाफ़िर,

और मैं अपनी मंज़िल का राहगीर हो जाऊंगा