Monday, 22 June 2026

 ज़िंदगी की सबसे कठिन बात यह नहीं होती कि कोई जानबूझकर हमारे साथ गलत करे। कठिनाई तब होती है जब गलती किसी की नीयत में नहीं, बल्कि उसके निर्णयों में होती है। कुछ फैसले उस समय सही लगते हैं, परिस्थितियाँ भी उनका साथ देती दिखाई देती हैं, लेकिन समय बीतने के बाद वही फैसले किसी और के जीवन में संघर्ष का कारण बन जाते हैं।

ऐसी परिस्थितियों में दोषी और पीड़ित की रेखा भी धुंधली हो जाती है। जिसने निर्णय लिया था, वह हर दिन भीतर ही भीतर इस बोझ के साथ जीता है कि काश उस समय कुछ और सोच लिया होता। और जिसे उन निर्णयों का परिणाम झेलना पड़ रहा होता है, वह भी जानता है कि सामने वाले की मंशा कभी गलत नहीं थी। इसलिए न वह खुलकर शिकायत कर पाता है, न दूसरा खुद को पूरी तरह माफ़ कर पाता है।

फिर एक अजीब सी ख़ामोशी दोनों के बीच रहने लगती है। कोई किसी को इल्ज़ाम नहीं देता, लेकिन दर्द दोनों के हिस्से में बराबर आता है। एक अपने किए हुए फैसलों के बोझ तले दबा रहता है, दूसरा उन फैसलों के परिणामों के साथ जीता रहता है।

शायद ज़िंदगी के कुछ दुःख ऐसे ही होते हैं जहाँ कोई अपराधी नहीं होता, फिर भी सज़ा चलती रहती है। और सबसे बड़ा दुख यह होता है कि दोनों एक-दूसरे का दर्द समझते हैं, मगर उसे कम करने की ताकत किसी के पास नहीं होती। यही वह जगह है जहाँ प्रेम, पश्चाताप और बेबसी एक साथ खड़े दिखाई देते हैं।

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