लोग अक्सर चेहरों को भूल जाते हैं,
मगर बातचीत का मेयार याद रखते हैं।
कितनी देर साथ बैठे थे, ये बात याद नहीं रहती,
मगर उन चंद लम्हों की गुफ़्तगू याद रखते हैं
कैसा महसूस कराया था, उलझनों में कैसे संभाला था,
उनकी ख़ामोशियों को कैसे सुना था। तुमने
लोग इंसानों को नहीं, एहसासों को याद रखते हैं।
साथ शायद बहुत लंबा न हो, मुलाक़ातें भी गिनी-चुनी हों,
मगर अच्छी गुफ़्तगू ,वक़्त सब लोग याद रखते हैं।
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