एक पत्थर, एक क़दम, एक आदमी ही काफ़ी है,
बदलने को ख़ानदान की बरसों पुरानी ग़ुरबत।
चाहिए मगर राह में हिम्मत, सब्र और कुर्बानी भी ,
सिर्फ़ ख़्वाबों से तक़दीरें नहीं बदला करतीं।
है हौसला तो उठा क़दम ,
अक्सर हिसाब सदियों की बेबसी जिल्लत का ,
एक पीढ़ी की मेहनत ,जद्दोजहद देती है चुका।
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