Thursday, 18 June 2026

 वो औरत है...


सुबह की पहली किरण से पहले जाग जाती है,

अपने हिस्से की नींद भी अक्सर भूल जाती है।


रसोई की भाप में सपने पकाती है,

और फिर दफ़्तर की फ़ाइलों में दिन बिताती है।


घर की ज़िम्मेदारियाँ भी उसके कंधों पर,

बाहर की दुनिया से लड़ाई भी उसी के हिस्से में।


कोई पूछे तो मुस्कुरा कर कह देती है,

"सब ठीक है..."

मगर ये दो लफ़्ज़ अक्सर सबसे बड़ा झूठ होते हैं।


उसके चेहरे पर हँसी रहती है,

पर आँखों में थकान का एक समंदर भी है।

वो टूटती भी है, बिखरती भी है,

मगर हर सुबह फिर ख़ुद को समेट लेती है।


शिकायतें बहुत हैं उसके पास,

मगर वक़्त कहाँ है शिकायत करने का।

ज़िंदगी ने उसे इतना मज़बूत बना दिया,

कि अब लोग उसके दर्द को भी ताक़त समझ लेते हैं।


सबको लगता है वो खुश है,

क्योंकि वो हँसती बहुत है।

कौन समझे कि कुछ लोग रोते कम हैं,

और मुस्कुराने की कला ज़्यादा जानते हैं।


वो कमज़ोर नहीं है,

बस कभी-कभी चाहती है कि कोई उसके कंधे से भी बोझ उतार ले,

कोई उससे भी पूछे 

"आज तुम कैसी हो?" 


होंठों पे हँसी रखती है, आँखों में नमी रखती है,

घर भी सँभालती है, नौकरी भी सभी रखती है।

लोग कहते हैं बड़ी मज़बूत है ये औरत,

कौन जाने कितनी ख़ामोशियाँ दिल में दबाए रखती है। 

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