एक ही डाल पे बैठे थे दो परिंदे,
दोनों अपनी-अपनी दुनिया में मशग़ूल।
एक थोड़ा सा संजीदा मिज़ाज,
तो दूसरा ख़यालों में कुछ ज़्यादा ही मशग़ूल।
यूँ ही सिलसिला-ए-गुफ़्तगू शुरू हुआ,
तो एहसास हुआ कि बातें कितनी ज़रूरी हैं।
ज़िंदगी को सिर्फ़ मोहब्बत नहीं चाहिए हर बार,
कभी-कभी बस कोई अपना, कोई हमदर्द भी ज़रूरी है।
किताबों, ख़यालों और ज़िंदगी की बातें,
और सामने कोई ख़ामोशी से सुनने वाला।
दिल के मौसम जब लफ़्ज़ों में ढलने लगें,
तो हर जुमला लगता है जैसे अपना-सा उजाला।
और जब बातें अपनी ज़िंदगी का अक्स बन जाएँ,
तो कहना भी इबादत लगे, सुनना भी सुकून।
फिर वक़्त का एहसास कहाँ रहता है,
बस चलता रहता है एहसासों का जुनून।
अंगिनत उलझनें, बे-शुमार फ़िक्रें,
फिर भी ख़्वाबों को हक़ीक़त करने का जुनून।
चेहरे पे मुस्कुराहट, दिल में हल्की सी उदासी,
और सफ़र-ए-ज़िंदगी तय करने का सुकून।
कभी अल्फ़ाज़ दिल की दास्ताँ कहते हैं,
कभी ख़ामोशियाँ भी गुनगुनाती हैं।
कोई सुकून पाता है दिल खोलकर कहने में,
किसी को चुपचाप सुनकर भी क़ुर्बत नज़र आती है।
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