अहमियत भी अगर अपनी बतानी पड़े,
तो तअल्लुक़ में वो बात कहाँ रहती है।
जहाँ हर जज़्बात को समझाना पड़े,
वहाँ ख़ामोशी भी ख़ामोश कहाँ रहती है।
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