माना की वक़्त वो भी कुछ अजीब था
मगर तब वो शख्स मेरे करीब था
आज से न थे हालात मेरे तब भी
उसे तब देखना तो मुझे नसीब था।
उजाला थोड़ा कर दो , मेरे लिए
जज्बातों का अंधेरा काफी है
तुम छोड़ गए थे अधूरा जो
उसको सुनना अभी बाकि है।
तुमने कहा था छु गई बातें मेरी
और मदहोश से तुम हो गए थे
बहुत सुनाये थे किस्से तुमने
मगर जो सुनना था मुझ को
वो बात अभी बाकि है
हर मंजिल पे मेरी उसकी टेडी निगाह थी
लगा मुझे जैसे किस्मत भी मेरी खफा थी
कई बार लगा लोट जा छोड़ के सबकुछ
मगर अपने वादे की बेड़िया दरमियान थी
लगारहा बदस्तूर मैं जीजान लगा के अपनी
कुछ अपनों की दुआ और उसका करम था
आँखे खुली तो मंजिल बांहो के दरमियान थी।
Thursday, 9 April 2020
रात की तन्हाई और मन में मचलते विचारों का द्वंद्व।
मेरे सच्चे सवाल और उस पे तेरे झूठे जवाबो का द्वंद्व।
मेरे मासूम सपने और तेरे किये फरेबी वादों का द्वंद्व।
बहुत खोजा, मगर, फिर भी जवाब से कोसो दूर हूँ मैं
उसपे बीते कल और आनेवाले कल के बीच का द्वंद्व।
Wednesday, 8 April 2020
जब भी पूछा
हर बार यही जवाब मिला मरने की भी फुर्सत नहीं उसको
आज बंदा वो फुर्सत में बैठा है, मरने से बचने के लिए