कुछ बातें तेरी याद रहीं,
कुछ मेरी ख़ामोशी में थीं,
पता दोनों को है
मंज़िलें अपनी एक नहीं थीं।
फिर भी जब हम तुम मिले,
दिल ने थोड़ा चैन लिया,
कहा कुछ नहीं तुमने,
पर दिल ने कुछ महसूस किया।
सोचा, शायद तुम भी कभी-कभी,
मेरी तरह ठहर जाते हो,
कोई मेरी बात याद करके,
बे-वजह मुस्कुराते हो।
ना वादा, ना कोई हक़ अपना,
ना कल का कोई ख़्वाब रखा,
जितना मिला, उतना जी लिया,
बाक़ी उस पर छोड़ दिया।
कभी तुम्हारी हँसी याद आई,
कभी वो अधूरी-सी शाम,
लगा तुम सामने बैठे हो,
और चलती रही घंटों बात।
कभी मेरी उलझन पढ़ ली तुमने,
कभी मैंने तुम्हारी थकान सुनी,
कोई वादा नहीं दरमियाँ अपने,
फिर भी कमी तुम्हारी लगी।
तेरी बातों में सुकून था,
मेरी बातों में ठहराव,
तुम मेरे थे ही नहीं कभी,
फिर क्यों इतना ये लगाव?
शायद तुमने चाहा हो मुझे,
या शायद बस मेरी फ़िक्र रही,
जो भी था, ख़ूबसूरत था,
उसे नाम देने की ज़िद नहीं।
कुछ लोग मिलते हैं ज़िंदगी के सफ़र में,
पर सफ़र उनका पूरा नहीं होता,
रखते हैं याद एक-दूसरे को,
हर रिश्ता मुकम्मल नहीं होता।
कल फिर अपनी-अपनी राहें होंगी,
शायद ये बातें भी ना होंगी,
हो जाएँ मशग़ूल अपनी ज़िंदगी में,
पर ये गुफ़्तगू याद रहेगी।
हाँ…
ये गुफ़्तगू याद रहेगी।
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