वो बोले
“कहाँ रह गए…
या चले गए तुम कोई और गली?”
हम मुस्कुरा दिए,
और धीरे से बोले
“गुफ़्तगू ख़ुद से,
ख़ुद के बारे में,
बहुत देर तक चली…”
दिल में रह गईं कुछ बातें,
कुछ आँखों ने कह दीं,
ख़ामोश रहे लब मगर,
धड़कनों ने सब कह दीं।
कभी ख़ामोशी दोनों के दरमियाँ,
तो कभी बातों का सिलसिला है…
वजह अलग-अलग है,
फिर भी दर्द एक-सा है…
एक दिल मोहब्बत छुपा रहा है,
दूसरा मोहब्बत में पड़ जाने से डर रहा है…
एक पास आना चाहता है, दूजा ख़ुद से ही लड़ रहा है…
कहानी दोनों की एक है ,बस रास्ते जुदा-जुदा हैं…
एक दिल इश्क़ कह नहीं पा रहा,दूजा इश्क़ सुन नहीं पा रहा है…
बारिश की बूँदें आसमाँ से यूँ गिर रही हैं,
जैसे ‘अर्श’ से ‘ख़ाक’ को मिलने की फ़रियाद हो…
हर बूँद में जैसे कोई अधूरी दास्ताँ,हर बूँद के पीछे किसी दिल की बात हो…
चुपचाप हम रहे भीगते,वो दूर खड़े देखते रहे…
कुछ कहना था दोनों को,दोनों ही मगर चुप रहे…
कभी सवाल थे आँखों में,कभी होंठों पे इनकार…
कहता रहा दिल “रुक जाओ”,
कहता रहा डर “न करो प्यार”…
एक दिल मोहब्बत छुपा रहा है,
दूसरा मोहब्बत में पड़ जाने से डर रहा है…
एक दिल इश्क़ कह नहीं पा रहा,
दूजा इश्क़ सुन नहीं पा रहा है…
किसी शाम शायद,ये ख़ामोशी भी टूटेगी…
किसी बारिश में शायद,ये दूरी भी छूटेगी…
तुम पूछ लेना फिर कहाँ रह गए थे?”
हम कह देंगे हँसकर “यहीं थे…
बस तुमसे मोहब्बत करने से
ख़ुद को रोक रहे थे…”
एक दिल मोहब्बत छुपा रहा है,
दूसरा मोहब्बत में पड़ जाने से डर रहा है…
दोनों को पता है इश्क़ क्या है,
फिर भी कोई इज़हार से डर रहा है…
बूँदें यूँ ही गिरती रहें,
अर्श और ख़ाक मिलते रहें…
हम तुमसे दूर सही, मगर दिल से कैसे दूर रहें…
एक दिन शायद ये फ़ासले मिट जाएँ,
ये ख़ामोशियाँ शायद गीत बन जाएँ…
और जो बात आज दिल में कहनी है,
वो कल लफ़्ज़ बनकर
लबों तक आ जाए…
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