मिल जाते हैं यूँ ही सफ़र में वो,
जिनसे हो जाता है गहरा दोस्ताना।
धीरे-धीरे दिल के क़रीब आना,
रोज़-रोज़ नई-नई बातें बनाना,
और न जाने कब आदत बन जाना।
कभी हँसी है, कभी उदासी,
कभी दिल की कुछ ख़ामोशी,
मुश्किल जो बातें करने में बयां,
फिर तुमसे ही वो सब कुछ कह जाना।
न कोई सवाल, न कोई गिला,
बस एक सुकून सा मिला है।
दुनिया में अपनी-अपनी मसरूफ़,
हर रिश्ते की अपनी है मजबूरी।
हर सफ़र में लगता है लेकिन,
धीरे-धीरे कम हो रही दूरी।
न कहना ज़रूरी, न सुनना ज़रूरी,
आँखें मिले और समझ लेना ज़रूरी।
शायद तुम भी कुछ सोचती हो,
शायद मैं भी कुछ कहता नहीं।
कुछ बातें आँखों तक आती हैं,
पर लफ़्ज़ों में ढलती नहीं।
न कोई सवाल, न कोई जवाब,
न कोई मंज़िल, न कोई हिसाब।
रोज़-रोज़, रोज़ाना तेरा यूँ ही मिल जाना,
गहरा होता दिन-ब-दिन अपना दोस्ताना।
मिल जाते हैं यूँ ही सफ़र में वो,
जिनसे हो जाता है गहरा दोस्ताना।
धीरे-धीरे दिल के क़रीब आना,
रोज़-रोज़ नई-नई बातें बनाना।
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