Tuesday, 6 October 2026

 कितने ज़ख़्म लिए फिरती है, मिलती फिर भी मुस्कुराकर,

तन्हा-तन्हा सी लगती है, भीड़ में भी खुद को छुपाकर।

एक अजनबी मिला, जो अपना सा  लगा,
 ख़ामोशी में भी, कोई रिश्ता सा पकने लगा।

एक ही राह, एक सफ़र, एक ही रास्ता,
बिन कहे समझ ले जो हर  दर्द,
हर एक वास्ता।

कहना न पड़े दर्द, कोई चुपचाप सुन ले,
आँखें नम हों अगर, कोई होंठों से चुन ले।

रखें दूरियाँ दरमियाँ, कहीं कोई ख़्वाब न बुन ले,
समझाएँ दिल को, कब दिल किसी की सुन ले।
​

यूँ ही मिल जाते हैं रिश्ते, दिलों के बिना नाम के,
जुड़ जाए दिल किसी से, तो फिर क्या उसे नाम दें,
रिश्ते बस महसूस हों जो, उन्हें क्या ही अल्फ़ाज़ दें।

लब कुछ नहीं कहते, ख़ामोशी बहुत कुछ बयान करती है,
ज़ुबाँ भी मोहब्बत है शायद…
मगर ये कहने से अब डरती है।

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