Tuesday, 6 October 2026

 दिन में मिलते नहीं तुम,

रातों को रोज़ाना आना-जाना है तुम्हारा।

ख़्वाबों में चुपके से आते हो,
फिर दिल चुरा ले जाना है हमारा
नींद मेरी, बातें तुम्हारी,
रातों का ये सिलसिला पुराना है हमारा।
सुबह होते ही खो जाते हो कहीं,
बस रात में ही  आना जाना  है तुम्हारा।
दिल को अब आदत सी हो गई तुम्हारी ,
बस अब हर रात इंतज़ार करना काम है हमारा

 मिल जाते हैं यूँ ही सफ़र में वो,

जिनसे हो जाता है गहरा दोस्ताना।
धीरे-धीरे दिल के क़रीब आना,
रोज़-रोज़ नई-नई बातें बनाना,
और न जाने कब आदत बन जाना।

कभी हँसी है, कभी उदासी,
कभी दिल की कुछ ख़ामोशी,
मुश्किल जो बातें करने में बयां,
फिर तुमसे ही वो सब कुछ कह जाना।

न कोई सवाल, न कोई गिला,
बस एक सुकून सा मिला है।
दुनिया में अपनी-अपनी मसरूफ़,
हर रिश्ते की अपनी है मजबूरी।
हर सफ़र में लगता है लेकिन,
धीरे-धीरे कम हो रही दूरी।

न कहना ज़रूरी, न सुनना ज़रूरी,
आँखें मिले और समझ लेना ज़रूरी।
शायद तुम भी कुछ सोचती हो,
शायद मैं भी कुछ कहता नहीं।
कुछ बातें आँखों तक आती हैं,
पर लफ़्ज़ों में ढलती नहीं।

न कोई सवाल, न कोई जवाब,
न कोई मंज़िल, न कोई हिसाब।
रोज़-रोज़, रोज़ाना तेरा यूँ ही मिल जाना,
गहरा होता दिन-ब-दिन अपना दोस्ताना।

मिल जाते हैं यूँ ही सफ़र में वो,
जिनसे हो जाता है गहरा दोस्ताना।
धीरे-धीरे दिल के क़रीब आना,
रोज़-रोज़ नई-नई बातें बनाना।

 


वो बोले 
“कहाँ रह गए…
या चले गए तुम कोई और गली?”

हम मुस्कुरा दिए,
और धीरे से बोले 
“गुफ़्तगू ख़ुद से,
ख़ुद के बारे में,
बहुत देर तक चली…”

दिल में रह गईं कुछ बातें,
कुछ आँखों ने कह दीं,
ख़ामोश रहे लब मगर,
धड़कनों ने सब कह दीं।

कभी ख़ामोशी दोनों के दरमियाँ,
तो कभी बातों का सिलसिला है…
वजह अलग-अलग है,
फिर भी दर्द एक-सा है…

एक दिल मोहब्बत छुपा रहा है,
दूसरा मोहब्बत में पड़ जाने से डर रहा है…
एक पास आना चाहता है, दूजा ख़ुद से ही लड़ रहा है…

कहानी दोनों की एक है ,बस रास्ते जुदा-जुदा हैं…
एक दिल इश्क़ कह नहीं पा रहा,दूजा इश्क़ सुन नहीं पा रहा है…

बारिश की बूँदें आसमाँ से यूँ गिर रही हैं,
जैसे ‘अर्श’ से ‘ख़ाक’ को मिलने की फ़रियाद हो…
हर बूँद में जैसे कोई अधूरी दास्ताँ,हर बूँद के पीछे किसी दिल की बात हो…

चुपचाप हम रहे भीगते,वो दूर खड़े देखते रहे…
कुछ कहना था दोनों को,दोनों ही मगर चुप रहे…

कभी सवाल थे आँखों में,कभी होंठों पे इनकार…
कहता रहा दिल  “रुक जाओ”,
कहता रहा डर “न करो प्यार”…

एक दिल मोहब्बत छुपा रहा है,
दूसरा मोहब्बत में पड़ जाने से डर रहा है…
एक दिल इश्क़ कह नहीं पा रहा,
दूजा इश्क़ सुन नहीं पा रहा है…

किसी शाम शायद,ये ख़ामोशी भी टूटेगी…
किसी बारिश में शायद,ये दूरी भी छूटेगी…

तुम पूछ लेना फिर कहाँ रह गए थे?”

हम कह देंगे हँसकर “यहीं थे…

बस तुमसे मोहब्बत करने से
ख़ुद को रोक रहे थे…”

एक दिल मोहब्बत छुपा रहा है,
दूसरा मोहब्बत में पड़ जाने से डर रहा है…
दोनों को पता है इश्क़ क्या है,
फिर भी कोई इज़हार से डर रहा है…

बूँदें यूँ ही गिरती रहें,
अर्श और ख़ाक मिलते रहें…
हम तुमसे दूर सही, मगर दिल​ से कैसे दूर रहें…

एक दिन शायद ये फ़ासले मिट जाएँ,
ये ख़ामोशियाँ शायद गीत बन जाएँ…
और जो बात आज दिल में कहनी है,
वो कल लफ़्ज़ बनकर
लबों तक आ जाए…

 कब तक रहूँ खड़ा दृढ़ हर वक़्त, इस मदमाते, आते बार बार तूफ़ान में,

अंदर से रोता दिल पर ऊपर से हँसना, खड़ा हूँ दृढ़ मगर हूँ परेशान मैं।

जब राहें धुंधली हो जाएँ, जब कोई दिखाई न दे ​​किनारा ,

​प्रभु आपका नाम रहे होठों पर, ​रहे ​हर घडी साथ तुम्हारा

​​रखना हाथ अपना सर पे उनके , कर दो जीवन मैं उजियारा

नैय्या जिन जिन की डूब रही थी उन सबको प्रभु तुमने है तारा

​प्रभु  आपका नाम रहे होठों पर, ​सदा रहे सर पे हाथ तुम्हारा

मैं थक गया हूँ प्रभु, अब आप ही मेरा हौसला बन जाना,

जो मेरे बस में नहीं रहा, उसे आप संभाल लेना।

खड़ा हूं अडिग हर आते तूफान में सिर्फ आपके ही सहारे,

सब सौंप दिया आपको प्रभु, आप ही अब मेरी नौका तारे।

 कितने ज़ख़्म लिए फिरती है, मिलती फिर भी मुस्कुराकर,

तन्हा-तन्हा सी लगती है, भीड़ में भी खुद को छुपाकर।

एक अजनबी मिला, जो अपना सा  लगा,
 ख़ामोशी में भी, कोई रिश्ता सा पकने लगा।

एक ही राह, एक सफ़र, एक ही रास्ता,
बिन कहे समझ ले जो हर  दर्द,
हर एक वास्ता।

कहना न पड़े दर्द, कोई चुपचाप सुन ले,
आँखें नम हों अगर, कोई होंठों से चुन ले।

रखें दूरियाँ दरमियाँ, कहीं कोई ख़्वाब न बुन ले,
समझाएँ दिल को, कब दिल किसी की सुन ले।
​

यूँ ही मिल जाते हैं रिश्ते, दिलों के बिना नाम के,
जुड़ जाए दिल किसी से, तो फिर क्या उसे नाम दें,
रिश्ते बस महसूस हों जो, उन्हें क्या ही अल्फ़ाज़ दें।

लब कुछ नहीं कहते, ख़ामोशी बहुत कुछ बयान करती है,
ज़ुबाँ भी मोहब्बत है शायद…
मगर ये कहने से अब डरती है।

 ओए होए पिंकी पिंकी

कुछ तो कहती हैं आँखें शराबी,  
होंठ गुलाबी, चुप हैं ऐसे,  
जैसे ग़ज़ल हो कोई लाजवाब सी।  

ओए होए पिंकी पिंकी
तू लगदी ऐ बड़ी कमाल सी,  
ऐसे ही हँसती रह तू हर पल,  
लगदी ऐ दिल दे बिल्कुल पास सी।  

हल्की सी मुस्कुरा दे जो शरमा के,  
लाल हो जांदे ने गाल तेरे,  
आँखें हो जाएँ गुलाबी-गुलाबी,  
जद वेखां मैं ख़्वाब तेरे।  

आँखों में नशा है बड़ा,  
चेहरे पे नूर तेरा खिला,  
जब छेड़े तू ज़ुल्फ़ों को,  
धक-धक धड़के दिल मेरा।  

चाल तेरी थोड़ी शराबी,  
नागिन वरगी तेरी अदा भी,  
टोर तेरी बोतल वरगी,  
ते तू लगदी परी गुलाबी।  

ना काजल, ना कोई श्रृंगार,  
फिर भी तू लगदी सोहणी यार,  
तेरी सादगी ते दिल हारे,  
तू ही मेरी फेवरेट यार। 

 न कोई शर्त है, न कोई दावा,

न कोई वादा, न कोई बहाना।

अपनी-अपनी दुनिया है दोनों की,

फिर भी दिल ने दिल को पहचाना।

न कुछ कहने की ज़रूरत यहाँ है,

न कुछ सुनने की जल्दी पड़ी है।

तू चुप रहे तो भी समझूँ मैं सब,

तेरी खामोशी में बात छुपी है।

न जाने ये कैसी अनकही डोर है,

जो दूर रहकर भी इतनी पास है…

कोई नाम नहीं है इस रिश्ते का,

फिर भी दिल को इसका एहसास है।

ये रिश्ता बस एक सुकून है, कोई मीठा-सा छलावा नहीं,

अपनी-अपनी राहें हैं मगर, एक-दूजे से कोई दूरी नहीं।

तेरी अपनी ज़िम्मेदारियाँ हैं, मेरी अपनी एक दुनिया यहाँ है,

दिन कितना भी उलझा रहे, तेरी बात से मिलती राहत सदा है।

कभी हँसी में बात निकलती, कभी आँखें ही सब कह जाती हैं,

जो बातें दुनिया से छुपाएँ, वो तुझसे आकर हो जाती हैं।

न कोई हक़ जताना यहाँ, न कोई शिकायत करनी है,

बस जब भी दिल थोड़ा थक जाए, तेरी आवाज़ ही सुननी है।

जाने ये कैसी डोर है, जो खिंचे बिना भी खिंचती है…

ज़िंदगी अपनी-अपनी सही, पर एक मोड़ पे मिलती है।

कल क्या होगा, किसे पता है, किस मोड़ पे कौन कहाँ होगा,

पर आज इतना काफी है, कोई तो है जो साक़ी होगा।

न साथ चलने की ज़िद है कोई, न साथ रहने का ख़्वाब है,

बस उम्र के इस लंबे सफ़र में, तू एक ख़ूबसूरत जवाब है।

ये रिश्ता बस एक सुकून है, कोई मीठा-सा छलावा नहीं,

अपनी-अपनी राहें हैं मगर, एक-दूजे से कोई दूरी नहीं।

इसे कोई नाम दिया भी तो क्या…

दो दिल अपनी दुनिया में खुश हैं, फिर भी एक-दूजे के पास हैं यहाँ।

न कोई वादा, न कोई मंज़िल, न कोई कहानी लिखनी है,

बस जब तक ये दिल समझे दिल को, तब तक ये दोस्ती रखनी है।

अपनी-अपनी राहों के मुसाफ़िर, फिर भी एक मोड़ पे मिलते हैं,

कुछ रिश्ते कोई नाम नहीं माँगते, बस दिल में चुपचाप खिलते हैं…

हाँ, दिल में चुपचाप खिलते हैं।